Wednesday, September 2, 2026

Please wait - Train is late by _ hrs!

यात्रीगण कृपया ध्यान दें ———————----- “यात्रीगण कृपया ध्यान दें। दिल्ली से कोटा जाने वाली ट्रेन अपने निर्धारित समय से एक घंटा विलंब से चल रही है। ट्रेन के आने की सूचना समय पर दे दी जाएगी।” दिल्ली के एक रेलवे स्टेशन पर सुप्रीम कोर्ट के एक जज साहब अपने पूरे परिवार के साथ वीआईपी लाउंज में बैठे हैं। बेटे का कोटा के एक संस्थान में दाखिला हुआ है। परिवार खुश है। एसी फर्स्ट क्लास की टिकट पहले से बुक है, बर्थ कन्फर्म है, सामान पैक है और सब समय पर स्टेशन पहुंच गए हैं। दिल्ली से कोटा की विमान सेवा होती तो शायद जज साहब परिवार सहित विमान से ही उड़ते, क्योंकि संजय सिन्हा जानते हैं कि बड़े लोगों की यात्रा भी बड़ी होनी चाहिए। लेकिन फिलहाल भरोसा भारतीय रेल पर है। ट्रेन को सुबह दस बजे आना था। एक घंटा लेट है। कोई बड़ी बात नहीं। परिवार साथ है। गपशप में एक घंटा निकल जाएगा। जज साहब भी सोचते हैं कि आखिर रेलवे है, कभी-कभी देर हो जाती है। लेकिन ठीक एक घंटे बाद फिर वही मधुर आवाज पूरे स्टेशन पर गूंजती है। “यात्रीगण कृपया ध्यान दें। कोटा जाने वाली ट्रेन अब अपने निर्धारित समय से दो घंटे विलंब से चल रही है। यात्रियों को हुई असुविधा के लिए भारतीय रेल क्षमा प्रार्थी है। लेकिन ट्रेन अब प्लेटफार्म नंबर पांच पर आने वाली है।” अब मामला थोड़ा गंभीर है। ट्रेन पहले प्लेटफॉर्म नंबर एक पर आने वाली थी, लेकिन अब घोषणा हुई है कि प्लेटफॉर्म नंबर पांच पर आएगी। जज साहब का पूरा परिवार प्लेटफॉर्म नंबर पांच पर जाकर खड़ा हो जाता है। हर आती हुई आवाज में लगता है कि शायद ट्रेन आ गई। हर गुजरती ट्रेन को परिवार की आंखें उम्मीद से देखती हैं। लेकिन ट्रेन नहीं आती। जज साहब अब टहल रहे हैं। चेहरे पर बेचैनी है। मन ही मन बुदबुदा रहे हैं, “साले रेलवे वाले भी कमाल करते हैं। पहले एक घंटा, फिर दो घंटे। कोई ठीक-ठीक बताता क्यों नहीं कि ट्रेन आएगी कब?” समय गुजरता जाता है। तीन घंटे। चार घंटे। पांच घंटे। अब पूरा परिवार परेशान है। बच्चे की पढ़ाई का सवाल है। होटल बुक है। आगे का कार्यक्रम बना हुआ है। छुट्टी का दिन देखकर यात्रा तय की गई थी ताकि समय पर लौटकर जज साहब अपने न्याय मंदिर में बैठ सकें और अगले दिन देश की जनता को न्याय दे सकें। पांच घंटे बाद पत्नी आखिर पूछ ही बैठती हैं, “आप इतने बड़े जज हैं। सबको सजा क्यों नहीं सुना देते? पकड़कर पूछिए कि ट्रेन क्यों नहीं आ रही?” जज साहब चुप हैं। फिर छठा घंटा आता है। फिर सातवां। अब जज साहब का धैर्य जवाब दे चुका है। वह सीधे स्टेशन मास्टर के कमरे में पहुंचते हैं। “भाई साहब, एक बात बताइए। अगर ट्रेन सात घंटे लेट है तो सात घंटे पहले क्यों नहीं बताया? हर एक घंटे बाद लाउडस्पीकर पर यही क्यों सुनाते हो कि ट्रेन एक घंटे बाद आएगी? आदमी एक घंटे की उम्मीद में सात घंटे खड़ा रहता है। एक ही बार बता दो कि ट्रेन सात घंटे, आठ घंटे, दस घंटे या चौबीस घंटे लेट है। कम से कम आदमी अपनी जिंदगी का बाकी समय तो बचा सके।” स्टेशन मास्टर बेहद सम्मान से जज साहब को कुर्सी देता है। पानी पिलाता है और कहता है, “हुजूर, इसमें हमारी कोई गलती नहीं है। यह एसएलपी है।” जज साहब चौंकते हैं। “एसएलपी?” “जी हुजूर। स्पेशल लेट पेटिशन, रेलवे का नया सिस्टम।” जज साहब कुछ क्षण स्टेशन मास्टर को देखते हैं। फिर कहते हैं, “ये तो हमारे यहां भी होता है। हम तो इसे एसएलपी यानी स्पेशल लीव पेटिशन, विशेष अनुमति याचिका कहते हैं। हम इसकी सुनवाई करते हैं। तुम स्टेशन मास्टर के लिए ये नया एसएलपी कहां से आ गया?” स्टेशन मास्टर मुस्कुराता है। “बिल्कुल हुजूर। हम भी उसी से प्रेरित हैं।” जज साहब की भौंहें तन जाती हैं। “मतलब?” स्टेशन मास्टर कहता है, “मतलब बहुत सीधा है हुजूर। जैसे आपकी अदालत में किसी निचली अदालत या हाईकोर्ट के फैसले के बाद मामला एसएलपी में आता है, वैसे ही हमारे यहां ट्रेन लेट होती है तो मामला एएसएलपी में चला जाता है। हमें पहले बताया जाता है कि एक घंटा लेट है। फिर एक घंटे बाद बताया जाता है कि एक घंटा और लेट है। फिर एक घंटा और। हमें भी नहीं पता कि ट्रेन कब आएगी। सिस्टम जितना बताता है, हम उतना ही जनता को बता देते हैं।” जज साहब नाराज होते हैं। “लेकिन इससे तो हजारों लोग परेशान होते हैं!” स्टेशन मास्टर बड़ी विनम्रता से कहता है, “जी हुजूर। यही तो सीख हमने आपसे ली है।” जज साहब चौंकते हैं। स्टेशन मास्टर आगे कहता है, “आपकी अदालत में भी तो आम आदमी किसी मुकदमे के साथ आता है। उसे लगता है कि आज फैसला होगा। आप पहली सुनवाई में स्टे देकर बैठ जाते हैं, फिर तारीखें मिलने लगती हैं। पहली तारीख, फिर दूसरी तारीख। फिर तीसरी। कभी मामला सुनवाई के लिए आता है तो समय खत्म हो चुका होता है। फिर आदमी अदालत से बाहर निकलकर यही सोचता है कि अब शायद अगली तारीख पर कुछ होगा।” “लेकिन यह न्याय की प्रक्रिया है!” जज साहब कहते हैं। स्टेशन मास्टर मुस्कुराकर कहता है, “हुजूर, यहां भी यही कहा जाता है। रेलवे की प्रक्रिया है। सिस्टम की प्रक्रिया है। हमें जो सूचना मिलती है, हम वही बताते हैं। जनता को इंतजार करना पड़ता है।” “लेकिन जनता परेशान होती है।” “जी हुजूर। यहां आपका परिवार परेशान है। वहां देश की जनता।” जज साहब कुछ बोल नहीं पाते। स्टेशन मास्टर अब शायद जरूरत से ज्यादा बोलने लगा है। “हुजूर, फर्क बस इतना है कि यहां ट्रेन आखिरकार आ जाती है। देर से सही, लेकिन आती जरूर है। आपकी अदालत में तो कभी-कभी आदमी इतना लंबा इंतजार करता है कि मुकदमा लड़ते लड़ते उसकी जिंदगी चली जाती है। और अगर किसी बड़े आदमी को स्टे मिल गया हो तो उसे तो और भी सुविधा है। ट्रायल रुका, कार्रवाई रुकी, नीचे की अदालत रुकी और साहब आराम से बैठे रहे।” जज साहब अब स्टेशन मास्टर को घूर रहे हैं। स्टेशन मास्टर फिर कहता है, “हुजूर, आप कहेंगे कि यह गलत है। मैं भी कहूंगा कि गलत है। लेकिन यहां तो हम सिर्फ ट्रेन लेट कर रहे हैं। वहां तो कभी-कभी किसी इंसान का पूरा जीवन लेट हो जाता है।” उसी समय लाउडस्पीकर फिर बजता है। “यात्रीगण कृपया ध्यान दें। कोटा जाने वाली ट्रेन अपने निर्धारित समय से आठ घंटे विलंब से चल रही है। यात्रियों को हुई असुविधा के लिए भारतीय रेल क्षमा प्रार्थी है।” स्टेशन मास्टर हाथ जोड़कर कहता है, “देखिए हुजूर, एक और तारीख आ गई।” और संजय सिन्हा सोचते हैं कि शायद फर्क सिर्फ इतना है कि रेलवे की देरी में आदमी प्लेटफॉर्म पर खड़ा होता है और अदालत की देरी में आदमी जिंदगी के प्लेटफॉर्म पर। नोट: 1. यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। 2. ऐसी कहानियों का जन्म भोगे हुए अनुभव से होता है। 3. रेलवे की ट्रेन देर से सही, आती तो है। 4. सवाल सिर्फ इतना है कि न्याय की ट्रेन कब आएगी?

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