Wednesday, August 26, 2026
Working against nature!
नदी ने अपना रास्ता नहीं बदला, हमने नदी का रास्ता रोक दिया.
तबाही में हर किसी को दुख है. पीड़ितों के साथ खड़ा होना और आपसी सहयोग जारी रखना हमारी जिम्मेदारी है. लेकिन इस तबाही के बीच एक सवाल पूछना भी जरूरी है कि आखिर हर बार दोष सिर्फ बारिश, नदी और पहाड़ों का ही क्यों?
इस तस्वीर को देखिए. हमने नदियों के किनारे नहीं, कई जगह नदियों के रास्ते में ही इमारतें खड़ी कर दीं. नदी के बहाव क्षेत्र में होटल, रेस्तरां और दुकानें बना दीं. नालों और छोटी जलधाराओं को पाट दिया. पहाड़ काटे और पानी के प्राकृतिक रास्तों को रोक दिया.
केदारनाथ की तबाही कौन भूल सकता है भला? एक पूरी सभ्यता नष्ट हो गई थी! लेकिन नदी के रास्ते में हमने सभ्यता बसाया ही क्यों?
नदी अपना रास्ता भूलती नहीं है.
पानी जब बढ़ता है तो वह उसी रास्ते से बहता है, जिसे प्रकृति ने उसके लिए सदियों में बनाया है. फिर उसके रास्ते में कौन आया?
हम आए.
बारिश प्राकृतिक है, लेकिन बारिश के बाद होने वाली तबाही को कई गुना बढ़ाने में हमारी लापरवाही और लालच की बड़ी भूमिका है.
नदी के किनारे अंधाधुंध निर्माण, पहाड़ों की कटाई, जंगलों का विनाश और प्राकृतिक जलधाराओं को रोकना विकास नहीं, भविष्य की तबाही की नींव है.
इसलिए पीड़ितों की मदद जरूर करें, लेकिन साथ ही यह सवाल भी पूछें कि नदी तबाही लेकर आई थी, या हमने उसके रास्ते में तबाही खड़ी कर रखी थी?
नदी को दोष देने से पहले हमें अपने किए हुए कुकृत्यों का हिसाब करना होगा.
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